पद्मनाभस्वामी स्वामी मंदिर का इतिहास

पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के केरल राज्य के तिरुवनंतपुरम शहर में स्थित है और यह भारतीय संस्कृति, इतिहास और धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह मंदिर विशेष रूप से अपनी ऐतिहासिक महत्ता, धार्मिक महत्ता और धन के लिए प्रसिद्ध है। पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के सबसे धनी मंदिरों में से एक है और इसकी धरोहर में विश्वास और रहस्यमयता की बहुत अधिक मान्यता है।

इस मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी निर्माण तिरुवनंतपुरम के महाराजाओं द्वारा किया गया था। यह मंदिर भारतीय स्थापत्यकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और इसकी विशालकाय शिलाओं, विश्वासयों और संस्कृति के उत्कृष्टता को देखकर हर कोई प्रभावित हो जाता है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रमुख द्वार के पीछे एक विशालकाय गोपुरम है जो कि इस मंदिर के विशेषता को और भी बढ़ाता है। इस मंदिर के अंदर एक विशालकाय स्वर्ण गरुड़ मूर्ति है, जो कि भगवान विष्णु के वाहन के रूप में पूजित है। इसके अलावा, यहां भगवान विष्णु की विभिन्न रूपों की मूर्तियाँ भी हैं, जो भक्तों को अपने धार्मिक आदर्शों के प्रति संजीवित करती हैं।

पद्मनाभस्वामी मंदिर की एक अन्य विशेषता यह है कि यह अत्यधिक समृद्धि और धन का भंडार है। मंदिर के कई कोष और अन्य स्थानों में विशाल संख्या में धन, गहने, रत्न और अन्य मूल्यवान वस्तुएं संग्रहीत हैं। इस अनूठे धन के संग्रह में भारतीय इतिहास, संस्कृति और धार्मिक अर्थ की अद्वितीय झलक है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर का एक और रहस्यमय और महत्त्वपूर्ण पहलू उसके अंदर छिपे हुए रहस्यों का है। मंदिर के कुछ भाग अभी तक अनुसंधान नहीं किए गए हैं और उनमें कई बंद दरवाजे, गुप्त पथ और अन्य गुप्त स्थान हैं जिनके बारे में बहुत कम जानकारी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मंदिर के अंदर और उसके चारों ओर कई रहस्यमय सृजन और कलात्मकता का भंडार है।

इस मंदिर का सबसे प्रसिद्ध और अद्वितीय पहलू उसके धन संग्रह का है। पद्मनाभस्वामी मंदिर में भारत के सबसे धनी देव समर्पित हैं और इस धन की मान्यता और महत्ता को लेकर विवाद भी है। यहां के धन के संग्रह की कुछ मान्यताएं और इतिहास इसे अद्वितीय बनाते हैं और इसे एक अनोखा स्थान देते हैं।

पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रति लोगों की भक्ति और आस्था का भी एक विशेष महत्त्व है। यहां हर वर्ष लाखों भक्त आते हैं और भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए प्रार्थनाएं करते हैं। इसके अलावा, मंदिर के आसपास के क्षेत्र में अनेक परंपरागत और ऐतिहासिक स्थल हैं जो इसे और भी महत्त्वपूर्ण बनाते हैं।

मंदिर का इतिहास

आठवीं सदी में एक महान साधु थे जो भगवान विष्णु की भक्ति में सदैव लीन रहते थे उनकी एक ही इच्छा थी कि उन्हें किसी भी तरह भगवान विष्णु के दर्शन हो जाएं किंतु हर दिन एक बालक उनकी तपस्या भंग करने आ जाता था एक दिन उन्होंने उस बालक को पकड़ लिया इससे पहले वह अपनी आंखें खोलते उससे पहले ही उस बालक ने कहा कि वह विष्णु का ही एक रूप है यदि वह महा विष्णु के दर्शन करना चाहते हैं तो वह उनके पीछे-पीछे अनंत काडू बन आ जाएं।

लेकिन उन्होंने कभी भी उस अनंत काडू वन का नाम नहीं सुना था किंतु महा विष्णु स्वरूप के दर्शन की लालसा में वह बालक के आभूषणों के स्वर के पीछे-पीछे चल दिए किंतु वह मार्ग भटक गए और अब वह अनंत काडू वन की खोज में इधर-उधर भटकने लगे तभी उन्हें एक महिला दिखी जो अपने छोटे से बालक को डांट कर कह रही थी कि फिर से उसने शैतानी की तो वह उसे अनंत काडू जंगल में छोड़ आएगी तभी वह तत्काल उस महिला के पास पहुंचे और उसंसे अनंत काडुवन के बारे में पूछा उस महिला के बताए हुए मार्ग पर चलते हुए वे अनंत काडू वन में पहुंचे।

जहां उन्होंने एक विशालकाय महुआ के पेड़ के नीचे खड़े उस बालक को देखा अचानक वह बालक अदृश्य हो गया और वहां खड़े महुआ के वृक्ष में से सबसे विशाल वृक्ष गिर पड़ा और वहां शेषनाग पर लेटे हुए महा विष्णु के दर्शन हुए कहा जाता है कि वह रूप इतना विशाल था कि उसका एक छोर तिरुवल्लम तो दूसरा छोर तिरुअप्पापुरम तक फैला था अर्थात श्री हरि के उस रूप का विस्तार लगभग 250 मील तक फैला हुआ था।

उन्होंने श्री हरि से प्रार्थना की वह अपना रूप सीमित करें ताकि वह उनकी पूजा और परिक्रमा कर सकें उनके अनुरोध पर महा विष्णु ने ऐसा ही किया फिर भी उनका रूप इतना बड़ा था कि वह उनके दर्शन एक बार में नहीं कर सके उनके सामने तीन महुआ के वृक्ष खड़े होने के कारण उन्होंने उस स्वरूप का दर्शन तीन भागों में किया।

आज भी उस विष्णु भक्त की समाधि इसी मंदिर के निकट है वे महान विष्णु भक्त थे श्री बिल्ब मंगलम स्वामी आर्य फिर यहीं से श्री पद्मा स्वामी के वर्तमान स्वरूप की कथा का आरंभ होता है जब उस समय के त्रावणकोर सम्राट को सूचना मिलती है तो वह भगवान विष्णु की प्रतिमा का निर्माण करवाते हैं और उसे मंदिर में स्थापित करते हैं यह मंदिर भारत के केरल राज्य की राजधानी तिरुवंतपुरम के पूर्वी किले के भीतर स्थित है यह मंदिर पद्मनाभस्वामी नाम से विश्व प्रसिद्ध है।

यह मंदिर भगवान विष्णु जी का मंदिर है इस मंदिर में भगवान विष्णु जी की बहुत ही सुंदर और भव्य मूर्ति है यह मूर्ति 18 फुट लंबी है यह मंदिर केरल और द्रविड़ वास्तु शिल्प शैली का अनुपम उदाहरण है यह विष्णु के 108 पवित्र मंदिरों में से एक है इस मंदिर के अंदर भगवान विष्णु की शेष शय्या पर लेटी हुई प्रतिमा है माना जाता है कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर ऐसे स्थान पर स्थित है जो 7 परशुराम क्षेत्र में से एक है इस मंदिर का संदर्भ पद्म पुराण स्कंद पुराण में भी मिलता है।

पुनः निर्माण

इस मंदिर का पुनः निर्माण वहां की राजा मार्तंड वर्मा ने कराया था मार्तंड वर्मा त्रावणकोर के प्रसिद्ध राजा थे उन्होंने इस मंदिर में मुरजपय की शुरुआत की अर्थात मंदिर में मंत्रोच्चार द्वारा पूजा अर्चना करना होती है वर्ष 1750 में मार्तंड वर्मा ने त्रावणकोर राज्य भगवान पदनाम को समर्पित कर दिया।

मार्तंड वर्मा ने यह कहा कि राज परिवार भगवान की ओर से राज्य का शासन करेगा और वे स्वयं और उनके होने वाले वंशज राज्य की सेबा पद्मनाभस्वामी के दास बनकर करेंगे तभी से यह परंपरा की शुरुआत हो गई इसलिए त्रावणकोर के प्रत्येक राजा के नाम के पहले पद्मनाभदास पुकारा जाता है त्रावणकोर राज्य द्वारा दिए गए दान गिवडीदानम कहा जाता है यह मंदिर अब एक ट्रस्ट चलाता है।

मंदिर का रहस्य

इस मंदिर का इतिहास आठवीं सदी से मिलता है जिसे भारत का दिव्यदेसम भी कहते हैं दिव्यदेसम भगवान विष्णु का सबसे पवित्र निवास स्थान है इस मंदिर को दुनिया का सबसे धनी मंदिर भी कहते हैं पद्मा नव स्वामी मंदिर कि गर्भ ग्रह में नीचे 7 बड़े-बड़े तहखाने हैं ।

कहा जाता है कि इन तहखानों के अंदर करोड़ो रुपयो के हीरे और कीमती रतन भरे हैं इसका पता लगाने के उद्देश्य से सन 2011 में एक सेवा निवृत्ति आईपीएस अधिकारी सुंदर राजन ने मंदिर के खजाने की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

इस याचिका को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ सदस्य कमेटी का गठन किया ख़ज़ाने का पता लगाने की लिए उन्होंने 6 तहखाना की तलाशी ली जिनके दरवाजे लोहे के बने थे इन तहखानों के अंदर जाकर देखा तो वहां उन्हें हीरे और अन्य देश कीमती रतन और पत्थरों के साथ-साथ एक लाख करोड़ की कीमती धातुओं से बनी मूर्तियां और सिंहासन मिले।

जबकि वहां के एक दरवाजे को अभी भी नहीं खोला जा सका क्योंकि कहां जाता है कि इस दरवाजे को श्रा उन्हें लहरों और सांपों की सरसराहट की आवाज में दरवाजे के पीछे से सुनाई दी दरवाजे के पीछे से उन्हें लहरों और सांपों की सरसराहट की आवाज़ सुनाई दी तब उन्हें यह तहखाना डरावना लगने लगा तो उन्होंने यह दरवाजा बंद रखने का निर्णय लिया ।

इसके बाद 1930 में पित दरवाजा भी कहते हैं इसलिए जो भी इस दरवाजे को खोलने की कोशिश करेगा उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति ने इन तहखानों को खुलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी थी उसे व्यक्ति की आकाश में मौत हो गई इस व्यक्ति की मौत के कारण वध किस्मती से यह धारणा और बोल्ट बी बी देवताओं द्वारा सुरक्षि लीत है।

ऐसा माना जाता है कि बोल्ट बी की रक्षा नागौ द्वारा की जाती है इसलिए इसके दरवाजे पर नाग बने हुए हैं कहां जाता है कि जो कोई भी इस दरवाजे को खोलने का प्रयास करेगा उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा सदियों पहले मंदिर प्रबंधन ने इस दरवाजे को खोलने की कोशिश की तो उन्हें दरवाजे के पीछे से लहरों और सांपों की सरसराहट की आवाज़ सुनाई दी।

तब उन्हें यह तहखाना डरावना लगने लगा तो उन्होंने यह तहखाना बंद रखने का निर्णय लिया इसके बाद 1930 में जब लुटेरों का एक गिरोह मंदिर को लूटने गया तो उन्होंने देखा की बहुत सारे सांपों का झुंड उनकी और आ रहा है ऐसा माना जाता है कि इस तहखाना के दरवाजे को प्राचीन काल में संतो द्वारा शक्तिशाली लोग पशम मंत्र का जाप करके कक्षा की प्रवेश द्वार को सील कर दिया था ऐसे दरवाजे पर ना कोई कुंडी है ना कोई ताला लगा है फिर भी इसे खोलना संभव नहीं है इस मंत्र उच्चारण की मदद से ही खोला जा सकता है इस गेट को सुरभि साड़ी का कोई सिद्ध पुरुष या तपस्वी ही गरुण मंत्र की मदद से खोल सकता है लेकिन मंत्र उच्चारण सही से नहीं किया गया तो उसकी मृत्यु भी हो सकती है 90 वर्षीय रावण कोरराज परिवार के प्रमुख तिरूनल मार्तंड वर्मा का कहना है कि अगर सातवें द्वारा के खुलने का मतलब देश में प्रलय आना है इसलिए हमारी कोशिश है कि इसे रहस्य ही रहने दिया जाए

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